रसखान के दोहे
जो रसना रस ना बिलसै तेविं बेहु सदा निज नाम उचारै । मो कर नीकी करैं करनी जु पै कुंज कुटीरन देहु बुहारन । सिध्दि समृध्दि सबै रसखानि लहौं ब्रज-रेनुका अंग सवारन । खास निवास मिले जु पै तो वही कालिन्दी कूल कदम्ब की डारन ।। रसखान अपने आराध्य से विनती करते हैं कि मुझे सदा अपने नाम का स्मरण करने दो ताकि मेरी जिव्हा को रस मिले । मुझे अपने कुंज कुटीरों में झाडू लगा लेने दो ताकि मेरे हाथ सदा अच्छे कर्म कर सकें । ब्रज की धूल से अपना शरीर संवार कर मुझे आठों सिध्दियों का सुख लेने दो । और यदि निवास के लिये मुझे विशेष स्थान देना ही चाहते हो प्रभु तो यमुना किनारे कदम्ब की डालों से अच्छी जगह तो कोई हो ही नहीं , ज हाँ आपने अनेकों लीलाएं रची हैं । रसखान के कृष्ण की बाललीला में उनके बचपन की अनेकों झाँ कि यां हैं । धूरि भरै अति सोभित स्याम जु तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी। खेलत खात फिरै अँगना पग पैंजनी बाजती पीरी कछौटी। वा छवि को रसखान विलोकत बारत काम कला निज कोठी। काग के भाग बडे सजनी हरि हाथ सौं ले गयो रोटी।। बालक श्यामजू का...

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