Chandragupta Maurya History

चन्द्रगुप्त मौर्य का इतिहास – Chandragupta Maurya History 

चन्द्रगुप्त मौर्य मौर्य साम्राज्य के संस्थापक थे और वे पुरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल रहे। चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण की तिथि साधारणतः 324 ईसा पूर्व की मानी जाती है, उन्होंने लगभग 24 सालो तक शासन किया और इस प्रकार उनके शासन का अंत प्रायः 297 ईसा पूर्व में हुआ। बाद में 297 में उनके पुत्र बिन्दुसार ने उनके साम्राज्य को संभाला। मौर्य साम्राज्य को इतिहास के सबसे सशक्त सम्राज्यो में से एक माना जाता है। अपने साम्राज्य के अंत में चन्द्रगुप्त को तमिलनाडु (चेरा, प्रारंभिक चोला और पंड्यां साम्राज्य) और वर्तमान ओडिसा (कलिंग) को छोड़कर सभी भारतीय उपमहाद्वीपो पर शासन करने में सफलता भी मिली। उनका साम्राज्य पूर्व में बंगाल से अफगानिस्तान और बलोचिस्तान तक और पश्चिम के पकिस्तान से हिमालय और कश्मीर के उत्तरी भाग में फैला हुआ था। और साथ ही दक्षिण में प्लैटॉ तक विस्तृत था। भारतीय इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल को सबसे विशाल शासन माना जाता है।ग्रीक और लैटिन खातो के अनुसार चन्द्रगुप्त सैंड्रोकोटॉ (Sandrocottos) और अन्ड्रोकोटॉ (Androcottos) के नाम से भी जाने जाते है। चन्द्रगुप्त ने अलेक्ज़ेण्डर द ग्रेट के युनानी सुदूर पूर्वी शासन काल को भी निर्मित किया और अलेक्ज़ेण्डर के सबसे शक्तिशाली शासक सेलुकस प्रथम निकटोर को युद्ध में पराजीत किया। और परिणामस्वरूप गठबंधन के इरादे से चंदगुप्त ने सेलुकस की बेटी से मित्रता की भावना से विवाह कर लिया ताकि वे सशक्त साम्राज्य का निर्माण कर सके और युनानी साम्राज्य से अपनी मित्रता को आगे बढा सके। इसके चलते भारत का पश्चिमी देशो से सम्बन्ध निर्मित होता गया और आसानी से भारतीय पश्चिमी देशो से व्यापार भी करने लगे। बाद में ग्रीक राजनीतिज्ञ मेगस्टेन्स ने मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र को भेट दी, जो उस समय मौर्य साम्राज्य का मुख्य अंग था।ज्यादातर भारत को एक करने के बाद चन्द्रगुप्त और उनके मुख्य सलाहकार चाणक्य ने आर्थिक और सामाजिक बदलाव किये। उन्होंने भारत की आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में भी सुधार किये। और चाणक्य के अर्थशास्त्र को ध्यान में रखते हुए राजनैतिक सुधार करने हेतु केंद्रीय प्रशासन की स्थापना की गयी। चन्द्रगुप्त कालीन भारत को प्रभावशाली और नौकरशाही की प्रणाली अपनाने वाले भारत के रूप में जाना जाता है जिसमे सिविल सेवाओं पर ज्यादा से ज्यादा जोर दिया गया था। चन्द्रगुप्त के साम्राज्य में एकता होने की वजह से ही उनकी आर्थिक स्थिति सबसे मजबूत मानी जाने लगी थी। और विदेशो में व्यापार होने के साथ ही देश का आंतरिक और बाहरी विकास भी होने लगा था।कला और शिल्पकला दोनों के ही विकास में मौर्य साम्राज्य का बहोत बडा योगदान रहा है। अपनी प्राचीन संस्कृति को आगे बढाने की सिख कुनबे अकियाई साम्राज्य और युनानी साम्राज्य से ही मिली। चन्द्रगुप्त के शासनकाल में धार्मिक गुरुओं को भी काफी महत्त्व दिया गया था। उनके साम्राज्य में बुद्ध और जैन समाज का तेज़ी से विकास हो रहा था। जैन खातो के अनुसार चन्द्रगुप्त ने अपने सिंहासन को स्वैच्छा से छोड़ा था क्यू की ऐसा कहा जाता है की उनके पुत्र बिन्दुसार ने जैन धर्म का आलिंगन कर लिया था और उनका पुत्र दक्षिणी साधु भद्राभाऊ का अनुयाई बन गया था। कहा जाता है की श्रवणबेलगोला (अभी का कर्नाटक) में अपनी इच्छा नुसार ही भुखमरी से ही उनकी मृत्यु हुई थी।

Comments

Popular posts from this blog

रसखान के दोहे

रहीम दास के दोहे

कबीर दास जी के दोहे